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March 13, 2026 10:00 AM

ज्ञान की परम्परा को गतिशील रखें : डॉ. ललित बिहारी गोस्वामी

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तीन दिवसीय ‘‘संस्कृति बोध परियोजना अखिल भारतीय कार्यशाला’’ का समापन, देशभर के अनेक राज्यों से 60 प्रतिनिधियों ने की प्रतिभागिता

कुरुक्षेत्र । विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के अध्यक्ष डॉ. ललित बिहारी गोस्वामी ने कहा कि अपने मूल को देखना, उसे ध्यान में रखना, उसके बारे में जानना बहुत अनिवार्य है। हमारे ज्ञान की परम्परा को गतिशील रखना अति आवश्यक है। पवित्र है गंगा क्योंकि काशी में गंगा उत्तरवाहिनी होती है, अपने मूल की ओर देखती है। ऐसे ही हम अपने मूल की ओर देखते हैं तो वास्तव में पवित्र काम कर रहे होते हैं। डॉ. गोस्वामी विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान में चल रही तीन दिवसीय ‘‘संस्कृति बोध परियोजना अखिल भारतीय कार्यशाला’’ के समापन अवसर पर अध्यक्षीय संबोधन दे रहे थे।

उनके साथ मंचासीन संस्थान के सहसचिव वासुदेव प्रजापति, संस्थान के निदेशक डॉ. रामेन्द्र सिंह संस्कृति बोध परियोजना के राष्ट्रीय संयोजक दुर्ग सिंह राजपुरोहित, संस्थान के शोध निदेशक डॉ. हिम्मत सिंह सिन्हा भी रहे।

डॉ. ललित बिहारी गोस्वामी ने आगे कहा कि यह टीक है कि आदर्श की बातें हमारे अंदर होती है, लेकिन धीरे-धीरे जब हम विचार करते हैं तो उम्र के साथ, अनुभव के साथ, विद्या के साथ विचार में परिवर्तन आता है। उस परिवर्तन को स्वीकार करना चाहिए। हम विचारशील बनें, जहां परिवर्तन की आवश्यकता है, वहां परिवर्तन करें। परिवर्तन को स्वीकार करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि दृढ़ता और कट्टरता में बहुत अंतर है। दृढ़ता से अपने मूल को पकड़ना, अपनी अस्मिता को पकड़ना, अपने स्वरूप को पकड़ना एक बात है। कट्टरता में विचार परिवर्तन, उसकी कोई गुंजाइश नहीं छोड़ते। उन्होंने कहा कि पूरी भारतीय परम्परा प्रश्न को बड़ा महत्व देती है। गीता श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद ही है। संवाद का अर्थ है बातचीत। अनेक-अनेक प्रश्न मन में उठते हैं, उन प्रश्नों को दूसरे के सामने रखना। नहीं तो संकोच के कारण हम प्रश्न नहीं रखेंगे और प्रश्न नहीं रखेंगे तो ज्ञान से वंचित रह जाएंगे। अच्छा, सटीक, सामयिक प्रश्न करना बड़ा कठिन है जबकि उत्तर अधिक आसान होता है। प्रश्नपत्र निर्माण सावधान, एकाग्रचित्त होकर करना पड़ता है। उसके सटीक उत्तर भी खोजने होते हैं। संस्कृति ज्ञान परीक्षा में भारतीय संस्कृति के प्रश्नों को छात्रों के सामने रखना उनकी स्मृति को जगाना है।

संस्कृति बोध परियोजना अखिल भारतीय कार्यशाला में प्रतिभागियों की उपस्थिति।

संस्थान के निदेशक डॉ. रामेन्द्र सिंह ने मंचासीन अधिकारियों का परिचय कराया। उन्होंने संस्कृति बोध परियोजना के अंतर्गत संस्थान की अनेक गतिविधियों जिनका पूरे देश में कुरुक्षेत्र से संचालन किया जाता है, के बारे में जानकारी दी तथा सभी प्रतिनिधियों को कार्य के सम्यक् विस्तार का श्रेय देते हुए अभिनंदन किया। सं.बो.प. के राष्ट्रीय संयोजक दुर्ग सिंह राजपुरोहित ने कार्यशाला में आए अधिकारियों एवं देशभर से आए प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया।

कार्य करने हेतु बनाए गए समूहों के प्रमुखों संस्कृति बोध परियोजना पूर्वी उ.प्र. के क्षेत्र संयोजक राजकुमार सिंह, पूर्वी उत्तर प्रदेश से गिरिवर, बिहार के सह क्षेत्र संयोजक संजीव कुमार झा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सह क्षेत्र संयोजक डॉ. विनोद शर्मा, मध्य क्षेत्र के क्षेत्र संयोजक अंबिकादत्त कुंडल, सरस्वती शिक्षा परिषद् जबलपुर से राघवेन्द्र शुक्ल, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के क्षेत्र संयोजक यशपाल, पूर्वी उ.प्र. के सह क्षेत्र संयोजक जियालाल ने तीन दिवसीय कार्य का वृत्त प्रस्तुत करते हुए कहा कि पुराने कार्यकर्ताओं के साथ-साथ नई पीढ़ी का अच्छा सहयोग मिला। सभी ने निष्ठा और तत्परता से कार्य किया। आगामी 2-3 वर्षों तक यही कार्यकर्ता आएंगे तो भविष्य के लिए अच्छे कार्यकर्ता तैयार होंगे।

तीन दिवसीय कार्यशाला के अंतिम दिन अखिल भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा हेतु प्रश्नपत्र एवं संस्कृति महोत्सव के लिए आयोजित होने वाले संस्कृति ज्ञान प्रश्नमंच हेतु प्रश्न संच निर्माण को अंतिम रूप दिया गया। कार्यशाला में मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, झारखंड, बिहार, विदर्भ, उत्तराखण्ड, छत्तीसगढ़, देवगिरी, उड़ीसा, कोंकण से आए 60 शिक्षाविदों ने प्रतिभागिता की।

Jarnail
Author: Jarnail

Jarnail Singh 9138203233 editor.gajabharyananews@gmail.com

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