“चौदह सौ तेंतीस की, माघ सुद्दी पन्द्रास
दुखियों के कल्याण हित, प्रगट गुरु रविदास”
गुरु रविदास जी ध्रुव तारा है : ओशो
ओशो रजनीश ने कहा कि भारत का आकाश संतों के सितारों से भरा है। अनंत-अनंत सितारे हैं, यद्यपि ज्योति सबकी एक है। संत रैदास उन सब सितारों में ध्रुवतारा हैं।इसलिए कि शूद्र के घर में पैदा होकर भी काशी के पंडितों को भी मजबूर कर दिया स्वीकार करने को।
पंजाब के रविदासिया लोगों ने साहिबे – कमाल जगत गुरु रविदास जी को जगत गुरु रविदास जी महाराज के नाम से पुकारा। उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और राजस्थान में उन्हें रैदास के नाम से ही जाना जाता है। गुजरात और महाराष्ट्र के लोग ‘रोहिदास’ और बंगाल के लोग उन्हें ‘रुइदास’ कहते हैं। कई पुरानी पांडुलिपियों में उन्हें रायादास, रेदास, रुहीदास, रेमदास और रौदास के नाम से भी जाना गया है। कहते हैं कि माघ मास की पूर्णिमा को जब गुरु रविदास जी ने जन्म लिया वह रविवार का दिन था जिसके कारण इनका नाम रविदास रखा गया। उनका जन्म माघ माह की पूर्णिमा को हुआ था। इस वर्ष 5 फरवरी 2023 को गुरु जी की जयंती मनाई जाएगी।

संत शिरोमणि कवि गुरु रविदास जी का जन्म माघ पूर्णिमा को 1377 ई.वी. को उत्तर प्रदेश के वाराणसी शहर के सीर गोवर्धनपुर गांव में हुआ था। उनकी माता का नाम कलसा (कर्मा देवी) तथा पिता का नाम संतोख दास (रग्घु) था। उनके दादा का नाम पूजनीय कालूराम जी, दादी का नाम पूजनीय लखपती जी, पत्नी का नाम पूजनीय लोनाजी और पुत्र का नाम पूजनीय विजय दास जी है। गुरु रविदास जी महाराज चर्मकार कुल से होने के कारण वे जूते बनाते थे। ऐसा करने में उन्हें बहुत खुशी मिलती थी और वे पूरी लगन तथा परिश्रम से अपना कार्य करते थे।
उनका जन्म ऐसे समय में हुआ था जब भारत में चारों ओर भेदभाव, छुआछूत, अत्याचार, गरीबी, भ्रष्टाचार व अशिक्षा का बोलबाला था। संत रविदास की ख्याति लगातार बढ़ रही थी जिसके चलते उनके लाखों भक्त थे जिनमें हर जाति के लोग शामिल थे। 52 राजे रानियां भी उनके शिष्य बने।

गुरु रविदास जी बहुत ही दयालु और दानवीर थे। गुरु रविदास जी ने अपने दोहों व पदों के माध्यम से समाज में जातिय भेदभाव को दूर कर सामाजिक एकता पर बल दिया और मानवतावादी मूल्यों की नींव रखी। गुरु रविदास जी ने सीधे-सीधे लिखा कि ” रैदास जन्म के कारने होत न कोई नीच, नर कूं नीच कर डारि है , ओछे करम की नीच” यानी कोई भी व्यक्ति जन्म से नही सिर्फ अपने कर्म से नीच होता है। जो व्यक्ति गलत काम करता है वो नीच होता है। कोई भी व्यक्ति जन्म के हिसाब से कभी नीच नहीं होता। गुरु रविदास ने अपनी कविताओं के लिए जनसाधारण की गुरमुखि भाषा का प्रयोग किया है। साथ ही इसमें अवधी,ब्रिज भाषा, राजस्थानी, खड़ी बोली और रेख्ता यानी उर्दू-फारसी के शब्दों का भी मिश्रण है। गुरु रविदास जी के लगभग चालीस पद सिख धर्म के पवित्र आदि ग्रंथ ‘गुरुग्रंथ साहब’ में भी सम्मिलित किए गए है।
कहा जाता हैं कि गुरु रविदास जी स्वामी रामानंद जी के शिष्य थे। गुरु रविदास तो सतगुरु कबीर के समकालीन व गुरूभाई माने जाते हैं। लेकिन कोई पुख्ता सबूत नशी मिलते। स्वयं कबीरदास जी ने ‘संतन में रविदास संत हैं’ कहकर इन्हें मान्यता देकर गुरु रविदास जी को खुद परमेश्वर माना।

मीरां ने कहा “गुरु मिल्यो रविदास जी”
राजस्थान की महान कवयित्री मीराबाई उनकी शिष्या थी। जिनके पदों में आता है ” गुरु मिल्यो रविदास जी- दीनी ज्ञान की गुटकी,
‘मीरा सत गुरु देव की करै वंदा आस,जिन चेतन आत्म कियो धन भगवन रैदास “
यह भी कहा जाता है कि चित्तौड़ के राणा सांगा की पत्नी झाली रानी उनकी शिष्या बनीं थी।
वाराणसी में भव्य स्वर्ण मंदिर
वाराणसी के सीर गोवर्धनपुर गांव में गुरु रविदास जी का भव्य स्वर्ण मंदिर है जिसे डेरा स्वामी सरवण दास जी सचखंड बल्लां जालंधर पंजाब के महान महापुरुषों के अथक प्रयासों से स्थापित हुआ। जहां पर आज विश्व भर से लाखों की संख्या गुरु पर्व मानते हैं जिसमे सभी जाति के लोग दर्शन करने के लिए पहुंचते हैं। वाराणसी में ही गुरु रविदास पार्क है जो नगवा में उनके यादगार के रुप में बनाया गया है जो उनके नाम पर ‘गुरु रविदास स्मारक और पार्क’ बना हुआ है जिसे उत्तर प्रदेश की तत्कालीन मुख्यमंत्री बहन कुमारी मायावती ने बनवाया था।

पंडित शारदा नंद के मृत बेटे मो जीवित किया
बचपन में गुरु रविदास जी व पंडित शारदा नन्द का बेटा वे दोनों अच्छे मित्र थे। एक बार वे दोनों छुपन छुपाई का खेल रहे थे, खेलते- खेलने रात हो गई, जिससे उन लोगों ने अगले दिन खेलने की बात कही। दुसरे दिन सुबह रविदास जी खेलने पहुँचते है, लेकिन वो मित्र नहीं आता है। तब वो उसके घर जाते है, वहां जाकर पता चलता है कि रात को उसके मित्र की मृत्यु हो गई है। ये सुन गुरु रविदास सुन्न पड़ जाते है, तब शारदा नन्द उन्हें मृत मित्र के पास ले जाते है। गुरु रविदास जी को बचपन से ही अलौकिक शक्तियां मिली हुई थी, वे अपने मित्र से कहते है कि ये सोने का समय नहीं है, उठो और मेरे साथ खेलो। ये सुनते ही उनका मृत दोस्त खड़ा हो जाता है। ये देख वहां मौजूद हर कोई अचंभित हो जाते है।
रविदास दास जी का स्वाभाव
गुरु रविदास जी को ब्राह्मण लोग तिलक लगाने, कपड़े एवं जनेऊ पहनने से रोकते थे। गुरु रविदास जी इन सभी बात का खंडन करते थे, और कहते थे सभी इन्सान को धरती पर समान अधिकार है, वो अपनी मर्जी जो चाहे कर सकता है। उन्होंने हर वो चीज जो नीची जाति के लिए मना थी, करना शुरू कर दिया, जैसे जनेऊ, धोती पहनना, तिलक लगाना आदि। ब्राह्मण लोग उनकी इस गतिविधियों के सख्त खिलाफ थे। उन लोगों ने वहां के राजा से गुरु रविदास जी के खिलाफ शिकायत कर दी थी। गुरु रविदास जी सभी ब्राह्मण लोगों को बड़े प्यार और आराम से इसका जबाब देते थे। उन्होंने राजा के सामने कहा कि शुद्र के शरीर मे भी लाल खून है, दिल है, उन्हें बाकी लोगों की तरह समान अधिकार है।

गुरु रविदास जी ने भरी सभा में सबके सामने अपनी छाती को चीर दिया और चार युग सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग की तरह, चार युग के लिए क्रमश: सोना, चांदी, तांबा और कपास से जनेऊ बना दिया। राजा सहित वहां मौजूद सभी लोग बहुत शर्मसार और चकित हुए और उनके पैर छूकर गुरु जी को सम्मानित किया। राजा को अपनी बचकानी हरकत पर बहुत पछतावा हुआ, उन्होंने गुरु से माफ़ी मांगी। संत रविदास जी ने सभी को माफ़ कर दिया और कहा जनेऊ पहनने से किसी को भगवान् नहीं मिल जाते है। उन्होंने कहा कि केवल आप सभी लोगों को वास्तविकता और सच्चाई को दिखाने के लिए इस गतिविधि में शामिल किया गया है। उन्होंने जनेऊ उतार कर राजा को दे दिया, और इसके बाद उन्होंने कभी भी न जनेऊ पहना, न तिलक लगाया।
गंगा का उल्टा बहना
रविदास जी के पिता की मौत के बाद उन्होंने अपने पड़ोसियों से मदद मांगी, ताकि वे गंगा के तट पर अपने पिता का अंतिम संस्कार कर सकें। ब्राह्मण इसके खिलाफ थे, क्यूंकि वे गंगा जी में स्नान किया करते थे, और शुद्र का अंतिम संस्कार उसमें होने से वो प्रदूषित हो जाती। उस समय गुरु जी बहुत दुखी और असहाय महसूस कर रहे थे, लेकिन इस घड़ी में भी उन्होंने अपना संयम नहीं खोया और भगवान से अपने पिता की आत्मा की शांति के लिए प्राथना करने लगे। फिर वहां एक बहुत बड़ा तूफान आया, नदी का पानी विपरीत दिशा में बहने लगता है। फिर अचानक पानी की एक बड़ी लहर मृत शरीर के पास आई और अपने में सारे अवशेषों को अवशोषित कर लिया। कहते है तभी से गंगा नदी विपरीत दिशा में बह रही है।

मन चंगा तो कठौती में गंगा’
गुरु रविदास की मशहूर कहावत ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’ को ज्यादातर लोगों को बोलते हुए सुना होगा। इस कहावत का अर्थ है अगर व्यक्ति का मन शुद्ध है, किसी काम को करने की उसकी नीयत अच्छी है तो उसका हर कार्य गंगा के समान पवित्र है। दरअसल इस कहावत का जन्म उस समय हुआ जब एक बार गुरु रविदास के कुछ विद्यार्थी और अनुयायी ने पवित्र नदी गंगा में स्नान के लिये पूछा तो उन्होंने ये कह कर मना किया कि उन्होंने पहले से ही अपने एक ग्राहक को जूता देने का वादा कर दिया है तो अब वही उनकी प्राथमिक जिम्मेदारी है। गुरु रविदास जी के एक विद्यार्थी ने उनसे दुबारा निवेदन किया तब उन्होंने कहा उनका मानना है कि “मन चंगा तो कठौती में गंगा” मतलब शरीर को आत्मा से पवित्र होने की जरुरत है ना कि किसी पवित्र नदी में नहाने से, अगर हमारी आत्मा और हृदय शुद्ध है तो हम पूरी तरह से पवित्र है चाहे हम घर में ही क्यों न नहाये।
राजा पीपा
राजा पीपा एक वैभवशाली क्षत्रिय नरेश थे। गुरु रविदास जी की प्रसिद्धि सुनकर वे उनके पास जाना चाहते थे किंतु एक चमार के पास जाने में उन्हें संकोच होता था। एक दिन वे चुपके से गुरु रविदास जी की झोपड़ी में जा पहुँचे और पहुँचते ही उन्होंने गुरु रविदास जी से नामदान के लिए बिनती की। गुरु रविदास जी उस समय चमड़ा भिगोने के कुंड से पानी निकाल रहे थे।

उन्होंने उसी कुंड के पानी को लेकर राजा से कहा ‘‘राजा। ले यह चरणामृत पी ले।’’ राजा के मन में झिझक हुई किंतु वह स्पष्ट इन्कार न कर सके। अत: हाथ आगे करके राजा ने अपने चुल्लू में पानी ले तो लिया पर, गुरु रविदास जी की आँख बचाकर उसे अपने कुरते की आस्तीन से गिरा दिया। गुरु रविदास जी इस बात को ताड़ गए परंतु उन्होंने कुछ कहा नहीं। राजा जल्दी से घर लौट आया और धोबी को बुलाकर आदेश दिया कि आस्तीन के दाग को छुड़ाकर उसे अच्छी तरह धोकर लाए। धोबी कुरते को घर ले गया और अपनी लड़की से कहा कि वह दाग को मुँह में लेकर चूसे ताकि दाग निकल जाए। लड़की छोटी थी, वह दाग चूसकर थूकने के बजाए निगलती गयी, जिससे उसका आंतरिक ज्ञान खुल गया और ऊँची आध्यात्मिक बातें करने लगी।
धीरे-धीरे यह बात पूरे शहर में फैल गयी। राजा पीपा यह सुनकर जब धोबी की लड़की के पास आया तो उसने बतलाया कि किस प्रकार राजा के कुरते के दाग को चूसने से उसे आंतरिक ज्ञान प्राप्त हुआ। यह सुन राजा पीपा को घोर पश्चापाप हुआ। वह दौड़कर गुरु रविदास जी की झोपड़ी में जा पहुँचा और उनसे पुन: चरणामृत देने की प्रार्थना की । इस पर रविदासजी ने कहा, ‘‘राजा, वह कुण्ड का पानी नहीं था, अमृत था। मैंने सोचा, मैं रोज पीता हूँ आज राजा भी पी ले किंतु तूने उसे चमड़े का पानी समझकर घृणा की और उसे कुरते में गिरा दिया। अब मैं तुझे नाम की दीक्षा दूँगा। कमाई करके इस दौलत को प्रकट कर लेना।’’

गुरु रविदास जी का ज्योति जोत समाना
चित्तौड़ में गुरु रविदास की छतरी बनी हुई है। मान्यता है कि वे वहीं से ज्योति जोत समा गए थे। हालांकि इसका कोई आधिकारिक विवरण नहीं है लेकिन कहते हैं कि वाराणसी में 1540 ई.वी. में उन्होंने देह छोड़ निराकार में विलीन हो गए थे।

Author: Jarnail
Jarnail Singh 9138203233 editor.gajabharyananews@gmail.com