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August 30, 2025 12:48 AM

जब बाघ के जबड़ों को दोनों हाथों से पकड़कर चीर दिया था हरिसिंह नलवा ने

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-डॉ उमेश प्रताप वत्स

एक बार महाराजा रणजीत सिंह जंगल में शिकार खेलने गये। कुछ सैनिकों सहित हरि सिंह भी उनके साथ थे तभी अचानक एक विशालकाय बाघ ने उन पर हमला कर दिया। सभी सैनिक डर के मारे पीछे हो गए। तभी हरि सिंह बाघ के सामने आ गए।हरि सिंह व बाघ का जबरदस्त मुकाबला हुआ। अंत में इस खतरनाक मुठभेड़ में हरि सिंह ने बाघ के जबड़ों को अपने दोनों हाथों से पकड़ कर उसके मुँह को बीच में से चीर डाला। उसकी इस बहादुरी को देख कर रणजीत सिंह के मुख से अचानक ही निकल गया अरे ! तुम तो राजा नल जैसे वीर हो। तभी से उनके नाम में नलवा जुड़ गया और वे सरदार हरिसिंह नलवा कहलाने लगे।

हरि सिंह नलवा का जन्म 28 अप्रैल 1791 को एक सिक्ख परिवार में गुजरांवाला पंजाब में हुआ था। इनके पिता का नाम गुरदयाल सिंह उप्पल और माता का नाम धर्मा कौर था। बचपन में उन्हें घर के लोग प्यार से हरिया कहकर पुकारते थे। सात वर्ष की आयु में इनके पिता का देहान्त हो गया था। महाराजा रणजीत सिंह ने 1805 ई. के बसन्तोत्सव पर एक प्रतिभा खोज प्रतियोगिता आयोजित की । जिसमें हरि सिंह ने भाला चलाने, तीर चलाने तथा अन्य प्रतियोगिताओं में अपनी अद्भुत प्रतिभा का प्रदर्शन किया। इससे प्रभावित होकर महाराजा रणजीत सिंह ने उन्हें अपनी सेना में भर्ती कर लिया। अपनी बहादुरी व समझ के कारण शीघ्र ही वे महाराजा रणजीत सिंह के विश्वासपात्र सेना नायकों में से एक बन गये।

उनको कश्मीर का राज्यपाल बनाकर भेजा गया वहा की स्थिति देखकर वे हैरान हो गए, उनके अन्दर गुरु गोविन्द सिंह का संस्कार और वीर बंदा बैरागी का रक्त था। वे पहले ऐसे हिन्दू वीर सेनापति थे जो ईंट का जवाब पत्थर से देना जानते थे।

‘शठे शाठ्यम समांचरेत’ जो जैसा होता वैसा ही व्यवहार करते थे। महाराजा रणजीत सिंह के सेनापति के रूप में उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैल चुकी थी। कश्मीर घाटी में पहुँचते ही मुगलों ने जिन मंदिरों को ढहाकर मस्जिद बनाई थी, हरिसिंह नलवा ने उसी स्थान पर मंदिरों का निर्माण कराया। उन्होंने आदेश जारी किया कि हिंदुओं की तरह मुसलमानों से भी टैक्स लिया जाय। मुस्लिम शासक हिन्दुओं के साथ जैसा व्यवहार करते , वे मुसलमानों के साथ वैसा ही व्यवहार करते थे।

उन्होंने मुसलमान बन चुके सैंकड़ों बंधुओं की घर वापसी भी की। जिससे बिना किसी संकोच के बड़ी संख्या में लोगो की घर वापसी होने लगी, लेकिन हिन्दुओ की नासमझी और रूढ़ियों के कारण ऐसा हो न सका , आज उसका परिणाम कश्मीरी पंडित झेल रहे है। 1837 में जामरोद पर अफगानों ने आक्रमण किया। रणजीत सिंह के बेटे का विवाह लाहौर में था हरिसिंह पेशावर में बीमार थे। आक्रमण का समाचार सुनते ही वे जामरोद पहुंचे। जबरदस्त मुकाबले के बाद अफगानी सैनिक पराजित हो भाग निकले नलवा और सरदार निधन सिंह उनका पीछा करने लगे। रास्ते में सरदार सम्सखान एक घाटी में छिपा हुआ था। घाटी में पहुँचते ही नलवा पर आक्रमण हुआ और हरिसिंह नलवा को धोखे से पीछे से गोली मार दी ।इसके बाद भी हरीसिंह दुश्मनों से लड़ते रहे जब वे जामरोद पहुचे तो उनका निष्प्राण शरीर ही घोड़े पर था।

महाराजा रणजीत सिंह के शासनकाल में 1807 ई. से लेकर 1837 ई. तक हरि सिंह नलवा लगातार अफगानों से लोहा लेते रहे। अफगानों के विरुद्ध लड़ाई जीतकर उन्होंने कसूर, मुल्तान, कश्मीर और पेशावर में सिख शासन की स्थापना की। काबुल बादशाहत के तीन पश्तून उत्तराधिकारी सरदार हरि सिंह नलवा के प्रतिद्वंदी थे। पहला था अहमद शाह अब्दाली का पोता, शाह सूजा, दूसरा फतहखान और तीसरा सुल्तान मोहम्मद खान। सरदार हरि सिंह नलवा ने अपने अभियानों द्वारा सिन्धु नदी के पार अफगान साम्राज्य के एक बड़े भू-भाग पर अधिकार करके सिख साम्राज्य की उत्तर पश्चिम सीमांत का विस्तार किया था।

हरि सिंह नलवा की सेनाओं ने अफगानों को खैबर दर्रे के उस ओर खदेड़ कर इतिहास की धारा ही बदल दी थी।खैबर दर्रे से होकर ही 500 ईसा पूर्व में यूनानियों के भारत पर आक्रमण करने और लूटपाट करने की प्रक्रिया शुरू हुई। इसी दर्रे से होकर यूनानी, हूण, शक, अरब, तुर्क, पठान और मुग़ल लगभग एक हज़ार वर्ष तक भारत पर आक्रमण करते रहे। तैमूर लंग, बाबर और नादिरशाह की सेनाओं ने भारत पर आक्रमण कर बहुत अत्याचार किये।

हरि सिंह नलवा ने खैबर दर्रे का मार्ग बन्द कर के इस ऐतिहासिक अपमानजनक प्रक्रिया का पूर्ण रूप से अन्त कर दिया था।1837 ई. में जब महाराजा रणजीत सिंह अपने बेटे के विवाह में व्यस्त थे तब सरदार हरि सिंह नलवा उत्तर पश्चिम सीमा की रक्षा कर रहे थे। महाराजा रणजीत सिंह की व्यस्ता के कारण एक महीने तक सैनिक न पहुँचने पर हरि सिंह नलवा अपने मुट्ठी भर सैनिकों के साथ वीरतापूर्वक लड़ते हुए 30 अप्रैल,1837 को वीरगति को प्राप्त हुए।

कहते हैं कि आज भी अफगानिस्तान की महिलाएं नलवा के नाम से अपने बच्चो को डराती है, (सो जा बेटे नहीं तो नलवा आ जायेगा) नलवा एक महान योद्धा, भारतीय सीमा का विस्तार करने वाले गुरु गोविन्द सिंह के असली उत्तराधिकारी थे। वे 12 बजे रात अथवा दिन को हमला करते थे लगता था कि जैसे कोई देवदूत हमला कर रहा हो। वह महान देश भक्त, सीमा रक्षक और धर्म रक्षक थे, वे किसी के विरोधी नहीं थे बल्कि उनके अन्दर हिन्दू स्वाभिमान था, ऐसे हिन्दू हृदय सम्राट वीर सेनापति नलवा को उनके बलिदान दिवस पर स्मरण करना हम सब भारतीयों का कर्त्तव्य है ।

स्तंभकार : प्रसिद्ध कथाकार, कवि एवं लेखक है ।
डॉ. उमेश प्रताप वत्स

Jarnail
Author: Jarnail

Jarnail Singh 9138203233 editor.gajabharyananews@gmail.com

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