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August 29, 2025 6:27 PM

इंडिया इंग्लैंडराज की देन भारत ही है ऐतिहासिक नाम

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देश में वर्तमान परिदृश्य में अजीबोगरीब मामले सामने आ रहे हैं। चुनाव निकट आते-आते कुछ नेता मानो बौखला गये हो। कोई सनातन को महामारी के समान बताने पर तुला हुआ है तो कोई इंडिया और भारत की तुलना में इतिहास को ठुकरा देना चाहता है। कोई चीन के पराक्रम के गीत गाकर अपने हिस्से को उसके नियंत्रण में बताने का प्रयास कर रहा है तो कोई आज भी भूख से बिलख रहे पाकिस्तान से यह उम्मीद लगाए बैठा है कि पाक के सहयोग से शायद वे अर्से बाद सत्तासीन हो जाये। खैर! मेरा तात्पर्य ब्रिटिश शासन से थोपे गए हमारे देश के इंग्लिश नाम इंडिया से है जो आज नई पीढ़ी के सिर चढ़कर बोल रहा है। किसी भी देश की उन्नति उसकी सांस्कृतिक विरासत में छिपी होती है। जब यह विरासत दरकने लगे तो देश अवनति की ओर बढ़ने लगता है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के राष्ट्रीय अधिवेशनों में विभिन्न प्रांतों से उपस्थित देश को समर्पित गणमान्य एवं दूरदर्शिता से परिपूर्ण सैंकड़ों चिंतक एकत्रित होते हैं, जिनकी चिंता का मूल उद्देश्य एक ही है, वसुधैव कुटुंबकम। दो शब्दों का यह वसुधैव कुटुम्बकम ऐसा नहीं कि थोड़ा सा प्रयास किया और मिल गया। इस उद्देश्य की प्राप्ति हेतु देश को को परम वैभव पर लेकर जाना होगा जिसके बाद ही भारत विश्वगुरु के स्थान पर स्थापित हो पायेगा और तभी वसुधैव कुटुंबकम का उद्देश्य प्राप्त हो पायेगा। देश को परम वैभव पर ले जाने के लिए पहला कदम संस्कृति के मार्ग से ही गुजरता है किंतु आज नवयुवक अपने इतिहास, अपनी संस्कृति को भूलते जा रहे हैं।

इसकी चिंता करते हुए ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ मोहनराव भागवत ने आह्वान किया कि अब समय आ गया है कि देशवासी देश का नाम इंडिया नहीं भारत कहकर पुकारे। राजकीय व्यवस्था में भी देश को भारत नाम से ही परिचित कराया जाये। डॉ मोहनराव भागवत अन्य नेताओं की भाँति वैसे ही कुछ भी नहीं बोल देते। उनके हर वाक्य हर शब्द के मायने बड़े गहरे होते हैं। वे भलीभाँति जानते हैं कि देश की नई पीढ़ी बहुत तेजी से आगे बढ़ रही है। मोबाइल के माध्यम से 18 घंटे सोशल नेटवर्किंग से जुड़े नवयुवक वहीआचरण करेंगे जो वे समाज में रहकर सीखेंगे। यह हम सबका दायित्व है कि युवा पीढ़ी को सही जानकारी प्राप्त हो।

भारत सरकार ने भी तय किया है कि अब समय आ गया है कि देश को उसके प्राचीन व समृद्ध नाम से जाना जाये और नई दिल्ली में आयोजित होने वाले आगामी जी-20 शिखर सम्मेलन के निमंत्रण पत्र में एक उल्लेखनीय बदलाव किया गया है। पारंपरिक “प्रेसिडेंट ऑफ इंडिया” के बजाय, निमंत्रण पत्रों पर अब “भारत के राष्ट्रपति” शब्द का प्रयोग किया गया है, इसने देश के नामकरण और इसके ऐतिहासिक अर्थों को लेकर व्यापक बहस को जन्म दे दिया है।

यद्यपि भारत नाम का वर्णन हमारे प्राचीन ग्रंथों में भी मिलता है। विष्णु पुराण में ‘भारत’ का वर्णन दक्षिणी समुद्र और उत्तरी बर्फीले हिमालय पर्वत के मध्य की भूमि के रूप में किया गया है।

उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः ।।

अर्थात् समुद्र के उत्तर और हिमालय के दक्षिण में जो देश है, उसे भारत कहते हैं और इस भूभाग में रहने वाले लोग इस देश की संतान भारती हैं।

यह केवल राजनीतिक या भौगोलिक इकाई नहीं है अपितु यह धार्मिक और सामाजिक-सांस्कृतिक इकाई का प्रतीक है। भरत एक प्रसिद्ध प्राचीन राजा का नाम था, जिसे भरत की ऋग्वैदिक जनजातियों का पूर्वज माना जाता है, जो सभी उपमहाद्वीप के लोगों के पूर्वज का प्रतीक है। भागवत पुराण के अध्याय 4 में भी भारत नाम का वर्णन इसप्रकार किया गया है-

येषां खलु महायोगी भरतो ज्येष्ठ: श्रेष्ठगुण।
आसीद् येनेदं वर्षं भारतमिति व्यपदिशन्ति॥

अर्थात् भगवान ऋषभ को अपनी कर्मभूमि अजनाभवर्ष में 100 पुत्र प्राप्त हुए, जिनमें से ज्येष्ठ पुत्र महायोगी भरत को उन्होंने अपना राज्य दिया और उन्हीं के नाम से लोग इसे भारतवर्ष कहने लगे। यद्यपि महाभारत में महर्षि ब्यास के अनुसार राजा दुष्यंत और शकुंतला के बेटे का नाम भरत था, जिनके नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा। जबकि इंडिया नाम सिंधु शब्द से लिया गया है, जो उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिमी भाग से प्रवाहित होने वाली एक नदी का नाम है। माना जाता है कि प्राचीन यूनानियों ने सिंधु नदी के पार रहने वाले लोगों को एंदुई कहा, जिसका अर्थ है “सिंधु के लोग।” बाद में फारसियों और अरबों ने भी सिंधु भूमि को संदर्भित करने के लिये हिंद या हिंदुस्तान शब्द का प्रयोग किया क्योंकि फारसी में ‘स’ का उच्चारण ‘ह’ किया जाता है।

यूरोपीय लोगों ने सिंधु कोइंडस रिवर कहना शुरु किया और इंडस से ही ‘इंडिया’ नाम अपनाया और ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के बाद यह देश का आधिकारिक नाम बन गया। किंतु अब देश को स्वतंत्र हुए 75 वर्ष से अधिक हो गया है तो अब हमारी क्या बाध्यता है कि हम यूरोपियनअत्याचारी सत्ता के दिये गये नाम को जबरन ढोये। मेरा मानना है कि सभी दलों को एक मत से इसका स्वागत करना चाहिए कि भविष्य में इंडिया नहीं केवल भारत ही हमारा गौरवशाली नाम जाना जायेगा।

भारत को इंडिया कहने वाला नवयुवक कल ब्रिटिश राज के भारत का अधिनायक स्वीकार करेगा फिर 1947 से लेकर कुछ समय पहले तक जो इतिहास पढ़ाया गया कि यदि अंग्रेज न आते तो हम कभी विकास के मार्ग पर आगे न बढ़ पाते तथा हम कभी सभ्य देश नहीं हो सकते थे,इस बात को भी सत्य मानने लगेगा। जब यही नवयुवक इंडिया को उसके प्राचीन, ऐतिहासिक नाम से जानेगा तो फिर उसके इतिहास को भी खंगालेगा। भारत को आज का भारत बनाने के लिए किन-किन महापुरुषों, महान क्रांतिवीरों ने अपना सर्वस्व दाँव पर लगा दिया,उन महावीरों के सपने क्या थे, वे कैसे पूरा करने है, तब नवयुवक इसका भी चिंतन करेगा। वह अपने देश के साथ अपनत्व से जुड़ेगा और तभी भारत परम वैभव की ओर आगे बढ़ेगा।

इंडिया को भारत कहना मात्र दो शब्दों की बात नहीं अपितु यह नई पीढ़ी की दिशा को तय करने की बात है। नेता लोग अपने-अपने स्वार्थों के कारण टेलिविजन बहस में अनेकों तथ्य देकर समझायेंगे कि इंडिया नाम भी बहुत प्यारा है तभी तो प्रधानमंत्री ने इंडिया नाम से अनेकों योजनाएं चलाई हैं। कोई यह भी कहेगा कि विपक्षी गठबंधन ने इंडिया नाम रख लिया है जबकि वह इंडिया नहीं डॉट डॉट डॉट है,इस नाम के कारण सत्ता दल घबरा गया है। कोई यह भी कहेगा कि आज इंडिया का नाम बदलकर भारत रख दिया है कल भारत का नाम बदलकर भाजपा रख देंगे आदि आदि।

बिना सिर पैैर की हजारों बातें होंगी और हो रही है। हर नेता जनता को बेवकूफ समझकर ज्ञान पेल रहा है और जो बेवकूफ है वे इनके तथ्यों को स्वीकार कर भी लेते हैं किंतु जनता का बहुत बड़ा हिस्सा अब समझदार हैं जो आकलन करके निर्णय लेता है। उसके सामने जब बीस नेता बीस तरह की बात करते हैं तो वह सोचने पर विवश हो जाता है कि सही तो कोई एक ही बात होगी और उस सही बात को पहचानने का प्रयास करता है। जनता के उस प्रयास में देश हित में सोचने वालों बुद्धिजीवियों का कितना सहयोग हो सकता है, योगदान हो सकता है, यही नई पीढ़ी के लिए मार्ग प्रशस्त करने का पावन कार्य हो पायेगा।

स्तंभकार

डॉ उमेश प्रताप वत्स
लेखक : प्रसिद्ध कथाकार, कवि एवं स्तंभकार है ।
umeshpvats@gmail.com

Jarnail
Author: Jarnail

Jarnail Singh 9138203233 editor.gajabharyananews@gmail.com

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