लगभग 600 वर्ष पूर्व जब भारतीय समाज जातिवाद, पाखंड और ऊंच-नीच की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था, तब एक ऐसी दिव्य ज्योति का प्राकट्य हुआ जिसने न केवल धर्म का सच्चा मार्ग दिखाया, बल्कि समाज को राजनैतिक शक्ति, आर्थिक आत्मनिर्भरता और शिक्षा का महत्व भी समझाया। वे महान क्रांतिकारी संत थे—संत शिरोमणि सतगुरु रविदास जी महाराज। आज उनके प्रकाशोत्सव के अवसर पर उनके उन उपदेशों को गहराई से समझने की जरूरत है, जो आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं।
शासक बनने का आह्वान: स्वराज ही सुख का आधार
सतगुरु रविदास जी केवल आध्यात्मिक शांति की बात नहीं करते थे, वे राज और शक्ति के महत्व को भली-भांति समझते थे। उन्होंने स्पष्ट कहा:
रैदास सुख से बसन की, है बस दोऊ ठाँव। पहला सुख स्वराज मह, दूजा मरघट गाँव॥
उनका यह संदेश अत्यंत क्रांतिकारी है। वे कहते हैं कि यदि आत्मसम्मान के साथ सुख से जीना है, तो स्वयं का शासन (स्वराज) स्थापित करो। जो कौम शासक नहीं बन सकती, उसकी स्थिति मृत समान है। उन्होंने “नरपत एक सिंहासन सोया, सपने भ्या भिखारी” के माध्यम से सोए हुए समाज को जगाया कि तुम अपनी शासक वाली पहचान भूलकर भिखारी जैसी स्थिति में आ गए हो। अपना राज वापस पाने के लिए जागो।
बेगमपुरा का संकल्प: एक आधुनिक लोकतंत्र की परिकल्पना
सतगुरु जी ने एक ऐसे आदर्श राज्य की कल्पना की थी जिसे उन्होंने बेगमपुरा (बिना गम का शहर) कहा। उनके शब्दों में:
ऐसा चाहूं राज में, जहाँ मिले सबन को अन्न। छोटा बड़ा सब सम बसें रविदास रहे प्रसन॥
यह एक ऐसे कल्याणकारी राज्य का मॉडल है जहाँ कोई भूखा न सोए, जहाँ जाति-पाति का भेद न हो और जहाँ हर नागरिक को समानता का अधिकार मिले। आज के आधुनिक लोकतंत्र की नींव कहीं न कहीं गुरु जी के इसी बेगमपुरा के विचार में छिपी है।
जातिवाद पर चोट: मानवता ही एकमात्र पहचान
जातिवाद को समाज की सबसे बड़ी बुराई मानते हुए गुरु जी ने कहा कि जैसे केले के तने को छीलने पर पत्तों के नीचे पत्ते ही निकलते हैं, वैसे ही इंसानों ने जाति के भीतर जाति बना ली है।
जात जात में जात है, ज्यों केतन के पात। रैदास मनुस ना जुड़े, जब लग जाति न जात॥
उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक जाति का भेदभाव समाप्त नहीं होगा, तब तक मानवता नहीं जुड़ सकती। उन्होंने योग्यता को जाति से ऊपर रखते हुए कहा कि गुणहीन व्यक्ति पूजने योग्य नहीं है, जबकि गुणवान व्यक्ति चाहे वह किसी भी कुल का हो, सदैव आदरणीय है।
शिक्षा और विवेक का महत्व
सतगुरु रविदास जी जानते थे कि अज्ञानता ही गुलामी की जड़ है। उन्होंने शिक्षा के अभाव को विवेक के दीपक का बुझना बताया:
रैदास अविधा अहित किन, विवेक दीप भयो मलीन।
उनका संदेश साफ था—बिना शिक्षा के ज्ञान का दीपक नहीं जल सकता। यदि समाज को तरक्की करनी है, तो उसे पाखंडवाद को त्यागकर शिक्षा और तार्किकता की ओर बढ़ना होगा।
श्रम की महत्ता: नेक कमाई का संदेश
सतगुरु जी ने कर्म को ही पूजा माना। उन्होंने सिखाया कि मेहनत की कमाई कभी निष्फल नहीं जाती।
रैदास परिश्रम कर खाइए, दे जो पार लगाए। नेक कमाई जो करे, कभी ना निष्फल जाए॥
उन्होंने स्वयं अपने पैतृक कार्य को पूरी ईमानदारी से किया और यह सिद्ध किया कि कोई भी कार्य छोटा नहीं होता, बस उसे करने वाले की नीयत और निष्ठा बड़ी होनी चाहिए।
संकल्प…
संत सतगुरु रविदास जी महाराज के उपदेश केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि जीवन में उतारने के लिए हैं। उनका जीवन हमें स्वाभिमान से जीने, शिक्षित बनने और संगठित होकर सत्ता की प्राप्ति करने की प्रेरणा देता है। आइए, इस प्रकाशोत्सव पर हम पाखंडवाद को छोड़कर उनके बताए ‘बेगमपुरा’ के सपने को साकार करने का संकल्प लें।
जय गुरुदेव, धन गुरुदेव जी
डॉ जरनैल सिंह रंगा
संपादक, गजब हरियाणा
Author: Jarnail
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